युं तो गलत नही होते अंदाज चहेरों के..लेकिन लोग,
वैसे भी नहीं होते जैसे नजर आते है..
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हर सिग्नल तेरी याद दिलाता है,
तूने भी रंग कुछ इसी तरह बदला था…!
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लिखना तो ये था कि खुश हूँ तेरे बगैर भी.
पर कलम से पहले आँसू कागज़ पर गिर गया..
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दिल से खेलना तो हमे भी आता है… लेकिन जिस खैल मे
खिलौना टुट जाए वो खेल हमे पसंद नही..
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दिल तो करता हैं की रूठ जाऊँ कभी बच्चों की तरह
फिर सोचता हूँ कि मनाएगा कौन….?
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बिना उसके दिल का हाल कैसे बतलाऊ…!!
जैसे खाली बस्ता हो किसी नालायक बच्चे का…!!
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एहसान किसी का वो रखते नहीं मेरा भी चुका दिया,
जितना खाया था नमक मेरा, मेरे जख्मों पर लगा दिया.
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तुम अपने ज़ुल्म की इन्तेहाँ कर दो,
फिर कोई हम सा बेजुबां मिले ना मिले…
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एक खेल रत्न उसको भी दे दो ,बड़ा अच्छा खेलती है वो दिल से
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हर रात जान बूझकर रखता हूँ दरवाज़ा खुला…
शायद कोई लुटेरा मेरा गम भी लूट ले….
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नींद भी नीलाम हो जाती है बाज़ार -ए- इश्क में,
किसी को भूल कर सो जाना, आसान नहीं होता !
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मैंने पूछा उनसे, भुला दिया मुझको कैसे..?
चुटकियाँ बजा के वो बोली…ऐसे, ऐसे, ऐसे
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